“लेखक / साहित्यकार के धर्म और कर्म”

“लेखक / साहित्यकार के धर्म और कर्म”
एक लेखक का सबसे बड़ा कर्म सारगर्भित शब्दों के चयन एवं जनसाधारण के सहज-सरल समझ की भाषा में मनुष्य जन्म का महत्व, विचारों की संकीर्णता से मुक्त मानवीय पराकाष्ठा उजागर करते हुए समाज की सच्चाइयों को उजागर करना ही नहीं अपितु प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने पर्यावरण संवर्धन तथा संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए सुरक्षित, तनावमुक्त समरस समाज की परिकल्पना को साकार करने और जनमानस का सशक्त मार्गदर्शन करना है।
जबकि एक लेखक का धर्म मानव कल्याण, सत्य की खोज, और पाठकों में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रेम, सहानुभूति और न्यायिक प्रक्रिया को विकसित करते हुए एक सुशिक्षित समाज की स्थापना है। जहाॅं मानवीय सभ्यता का विकास सदा नैतिकता पर ही आधारित रहे।
अतः: लेखक के कर्म यथार्थ का चित्रण समाज में जो घटित हो रहा है, उसे बिना किसी दिखावे या पक्षपात के शब्दों में उतारना,जागरूकता फैलाना:,कुरीतियों, शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और आम जनता को जागरूक करना है।
आदर्शोन्मुखी दृष्टि रखते हुए केवल कमियों को उजागर न करना, बल्कि समाज को बेहतर बदलाव और एक नई दिशा की ओर प्रेरित करना है
लेखक का धर्म सत्य के प्रति निष्ठावान रहते हुए अपने लेखन के माध्यम से सच का साथ देना, चाहे वह सत्ता या समाज के कितने भी खिलाफ क्यों न हो! मानवता को संरक्षण देते रहना, साहित्य को नफरत या हिंसा फैलाने का माध्यम न बनाकर, उसे भाईचारे, करुणा और सौहार्द का साधन बनाना है।
एक लेखक की जिम्मेदारी सजग सिपाही बन जन-सरोकार रखते शोषितों, वंचितों और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बनना और उनके दर्द को दुनिया तक पहुंचाना है।
अंततोगत्वा एक लेखक और साहित्यकार के कर्म और धर्म पृथक नहीं अपितु चोली-दामन का साथ लिए मानवीय समाज के लिए एक सशक्त दर्पण है। जहाॅं लेखकों साहित्यकारों के माध्यम से स्वस्थ लोकतंत्र फलता-फूलता रहे और सभी को समान रूप से जीने का अधिकार समान शिक्षा, स्वास्थ्य तथा न्याय साथ मिले।
जहाॅं लेखक और साहित्यकार के लिए प्रतिष्ठा तथा पुरस्कार पाने की लालसा गौण होने चाहिए। तभी अपने कर्म को धर्म के साथ निभाते हुए स्वर्णिम भविष्य के निर्माता बनेंगे। जो भारत की इस पावन धरा में ही संभव है।
आलेख
सुरेश कुमार बन्छोर “अभ्यार्थी”
हथखोज / देमार (पाटन)
तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़

