प्रेम

 

प्रेम

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जिस “ताजमहल” को सारी दुनिया मानती प्रेम की निशानी,

वो ताजमहल कितना सुन्दर,

सफेद संगमरमर में बना,

प्रेम की अद्वितीय निशानी,

शाहजहां को इतना “प्रेम” था, अपनी पत्नी मुमताज से

कि … उनकी याद में बनवा दिया,

परन्तु,

 इतिहास के पन्नों में बहुत अद्वितीय प्रेम छिपा है, 

देखो ज़रा

श्रीराम भी अपनी पत्नी के लिए रामसेतु बनवा दिये,

न मजदूरों के हाथ कटे…

न कटे हैं धर,शीश…..

उनकी प्रेम निशानी ने दिया रामसेतु का निर्माण,

जीते जी सीता माँ को मिला ये पूर्ण सम्मान,

शहजहां ने मरने पर दफनाया, मुमताज को…..

ये कैसा “प्रेम”…

ये कैसा “संदेश”….

मरने तक करो इन्तज़ार…

मजदूरों का ले लो प्राण….

निर्माण या विध्वंश…

जीते ही कुछ कर जाओ,

तो ,

निश्चय ही  “प्रेम “है अदभूत,

रामसेतु के निर्माण में मजदूरों के हाथ कटे नहीं

बल्कि सब बानर सेना प्रेम से वशीभूत होकर बने निर्माण में सहायक,

प्रेम की निशानी ताजमहल,

या

रामसेतु,

इसका करो स्वयं ही विचार,

ऐसे बहुत हैं हमारे इतिहास में

ये तो है मेरा विचार,

द्वारिका, वृन्दावन या मथुरा

सभी प्रेम का प्रमाण है,

जिसमें चित आलोकित हो

वही प्रेम प्रधान है।।

श्यामा प्रभाकर दास

               मुम्बई

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