लिखना

लिखना
———————————–कभी कभी लिखना स्वयं के लिए पुरस्कार से कम नहीं ।
क्या लिखना है….
क्यों लिखना है……
पर लिखना भी एक कला है ।
कोई करे टिप्पणी…
कोई करे समीक्षा…
कोई करे आलोचना ….तो…
कोई सीधे दे …. निष्कर्ष..
जब भी स्वयं कलम उठाएं ।
थोड़े से जब मन मुस्कराएं ।
थोड़े से जब व्यथित हो जाएं ।
हृदय पटल पर लिखते जाएं ।
भावना अपने मन की,
कोई पढ़ें या ना पढ़े
अपने लिए तो सब है सही ।
मन का भाव उतारकर
शब्दों में पिरोकर…
कहीं दर्द….
कहीं विरह..
कहीं प्रेरणा…
कहीं खुशी..
मोती जैसी माला बनकर
आएगी स्वयं के समक्ष,
बार बार उसे पढ़कर प्रतीत ऐसा होगा … जैसे किसी सामारोह में पुरस्कार मिलता होगा ॥
निश्छल मन को समझाकर..
स्वयं का अवलोकन… ।
लिखना तब भी जरूरी है जब कोई भी न हो संकलन,
न सम्पादन,
न पत्रकार,
न अखबार में प्रेषित हो…. ।
स्वरचित अप्रेषित
स्वयं के लिए अपेक्षित हो ।
लिखना कभी कभी स्वयं के लिए पुरस्कार से कम नहीं ।
लिखते लिखते स्वयं का आंकना, तुलना या सार… न… हो ।
बस तन्मयता से एकाग्रता का छोटा सा उपहार हो ।
चेहरे का दर्द दिख न पाए ऐसी
शब्दों का मंजन हो ।
चटपटा सा बना जैसे कोई व्यंजन हो ।
आरोह, अवरोह का कोई न बंधन हो ।
जब भी ,
जहां चाहे ,
पूर्ण विराम की स्वतंत्रता हो ।
स्वयं का लिखना स्वयं का ही समीक्षा हो ।
पुरस्कार का लोभ नहीं,
अन्तर्मन को झांकना हो ।
जो निकल न पाए, कुंठित होकर….
उस शब्द की व्याख्या हो ।
लिखना स्वयं के लिए कभी कभी पुरस्कार से कम नहीं होता…
लिखना में हो वंदना माता शारदा की ।
गणपती की जयकार हो ।
सकारात्मकता ऊर्जा की पहचान हो।
दूषित मन भाव को दूर करे ।
लिखना स्वयं के लिए स्वयं की पहचान हो ॥
श्यामा प्रभाकर दास
मुंबई

