नवरात्रि और संस्कृति

नवरात्रि और संस्कृति :
यह केवल पर्व नहीं है,यह भारत की आत्मा का उत्सव है।यह नवरात्रि है—जहाँ संस्कृति स्वयं आरती बनकर जलती है।
जब दीपों की पंक्तियाँ सजती हैं,और मन में आस्था जागती है,तब लगता है मानोहमारी संस्कृति फिर से मुस्कुराती है।
माँ दुर्गा के नौ रूपों मेंजीवन के नौ संदेश छिपे हैं—संयम, साहस, करुणा और शक्ति,जो हमें सही राह दिखाते हैं।
गरबा की हर थाप मेंसिर्फ संगीत नहीं होता,उसमें हमारी परंपराएँ,हमारे संस्कार भी धड़कते हैं।
नवरात्रि हमें सिखाती है—अंधकार कितना भी गहरा हो,एक छोटा सा दीपपूरा जीवन रोशन कर सकता है।
यह संस्कृति हमें जोड़ती है,भाषा और भेद से ऊपर उठाकर,एकता और प्रेम कासंदेश सिखाती है।
आओ इस नवरात्रि हम प्रण करें—केवल पर्व न मनाएँ,बल्कि अपनी संस्कृति कोअपने जीवन में अपनाएँ।
नवरात्रि केवल नौ रातें नहीं,यह हमारी पहचान है—यह हमारी संस्कृति कीअमर उड़ान है।
जय माता दी
नाम— मोनालिसा पोद्दार
काव्य गोष्ठी के लिए


अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक मित्र मंडल जबलपुर समूह 3
विषय – नवरात्रि और संस्कृति
जय-जय माँ दुर्गे भवानी,
तेरी महिमा जग ने जानी।
व्रत-भक्ति का दीप जलाएँ,
हम संस्कृति की शान बढ़ाएँ।
नवरात्रि का पावन व्रत है,
संस्कृति की अनुपम रीत।
आस्था,संयम,साधना से,
जीवन बनता मधुर संगीत।
व्रत नहीं केवल भोजन त्याग,
यह मन का भी है परिष्कार।
इंद्रियों पर संयम रखकर ही,
होता है आत्मा का श्रृंगार।
दिनचर्या में संयम आ जाता,
व्रत वाणी में मधुरता लाता है।
हर कर्म बन जाता पूजा जैसा,
ये जीवन को पावन बनाता है।
माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों में,
बसती शक्ति अपार महान।
धैर्य,करुणा,साहस देकर,
माँ करती सबका कल्याण।
घर-घर दीपक जगमग करते,
मंदिर में गूँजे जय-जयकार।
संस्कृति के यही रंग निराले,
जोड़ें हमको सबसे बारंबार।
कन्या पूजन की मधुर परंपरा,
नारी-शक्ति का करे सम्मान।
सीख यही देती नवरात्रि हमको,
कन्या रूप में बसते भगवान।
व्रत से तन को संयम मिलता,
मन को मिलता है विश्राम।
भक्ति-भाव में डूबा जीवन,
ले जाता हमें प्रभु के धाम।
आओ मिलकर व्रत निभाएँ,
माँ का गुणगान सबको सुनाएँ।
संस्कृति की इस अमर धरोहर से,
भारत संग विश्व को भी महकाएँ।
मंजूषा दुग्गल
शिक्षिका/ कवयित्री/ लेखिका
करनाल (हरियाणा)