अजनबी का साथ

 

 अजनबी का साथ
लेखिका: मनीषा कुमारी

थक चुके थे बस कदम,
रुकना मगर मंज़ूर न था,
हाथों में भरा था सामान,
पर हाथों में अब वो ज़ोर न था।

रात की राहें सुनसान थीं,
और मन थोड़ा घबराया था,
तभी किसी ने पास आकर
मुझसे धीरे से ये कहा था—

“ये जो थैला भारी सा है,
क्या मैं इसे उठा लूं?”
उसकी बातों में सच्चाई थी,
पर मन बोला— “कैसे भरोसा कर लूं?”

अनजान चेहरा, अनजानी बात,
मन में उठे कई सवाल,
क्यों करे कोई यूँ ही मदद,
क्या है इसके पीछे का ख्याल?

फिर उसने दोबारा पूछा,
आवाज़ में था अपनापन,
उम्र रही होगी सोलह-सत्रह,
पर संस्कारों में था अपनापन।

न उसने मेरा स्त्री होना देखा,
न कोई और विचार किया,
बस इंसानियत के नाते उसने
मदद करने का निर्णय लिया।

शायद यही उसकी पहचान थी,
या घर से मिला कोई पाठ,
कि राहों में जो थक जाए,
उसे देना चाहिए साथ।

आज उसी राह पर चलते-चलते,
एक अजनबी मेरा बन गया,
मेरे हाथों का बोझ उठाकर
कुछ दूर मुझे पहुँचा गया।

मैंने फिर वो थैला लेकर
उसे धन्यवाद कहा,
और दिल में एक सुकून सा था—
कि इंसानियत अभी भी ज़िंदा रहा।

राहों में यूँ ही कभी-कभी,
मिल जाते हैं कुछ खास,
जो सिखा जाते हैं चुपके से—
अजनबी भी बन सकते हैं विश्वास।

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