वृद्धाश्रम बढ़ते क्यों जा रहे हैं?

शीर्षक:-काँच की किनकियाँ और सूने आँगन

तरक़्क़ी की हवाओं में यह कैसा दौर आया है,मकानों को तो बड़ा किया, पर दिलों को छोटा पाया है।जहाँ आँगन की छाँव में कभी खुशियाँ संवरती थीं,वहाँ अब वृद्धाश्रमों का एक सूना सा साया है।ये वृद्धाश्रम आख़िर क्यों बढ़ते ही जा रहे हैं?
अपनों के होते हुए भी बुज़ुर्ग क्यों आँसू बहा रहे हैं?
जिस बाप ने आजीवन काँच की किनकियों पर क़दम बढ़ाए,अपनी फटी कमीज़ में छुपाकर पसीने, बच्चों के ख़्वाब सजाए।अंजुरी भर धूप-दीप से जिसने महकाई थी घर की बगिया,आज उसी के ख़ून ने उसके हिस्से में सूने कोने लिखवाए।
‘हम और हमारे’ के शोर में संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं,संस्कार दम तोड़ रहे हैं, और स्वार्थ के रंग निखर रहे हैं।आलीशान फ्लैटों में अब बूढ़े माँ-बाप को जगह नहीं मिलती,मोबाइल की इस दुनिया में अपनों से बात करने की फुर्सत नहीं मिलती।जिन्होंने उंगली पकड़कर ज़माने में चलना सिखाया था हमें,आज उनके थके हाथों को दो गज़ सहारे की मोहलत नहीं मिलती।पत्थरों की मूर्तियों को पूजने में सब व्यस्त हो गए,घर के जीवित भगवानों को भूलकर, लोग कितने पस्त हो गए।यह महज़ इमारतों का बढ़ना नहीं, हमारी नैतिक हार की कहानी है,रिश्तों के दिवालिया होने की यह एक सच्ची और कड़वी निशानी है।रोक लो इन आँसुओं को, सँभाल लो अपने घर के बुज़ुर्गों को,क्योंकि उनकी दुआओं के बिना यह सारी दुनिया बेमानी है।
©️®️✍️ रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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