संस्कारों की जड़ें हमारे पितर

 

संस्कारों की जड़ें हमारे पितर

पेड़ की शोभा पत्तों से नहीं,
वो शोभा जड़ों से होती है,
इंसान की पहचान पैसों से नहीं,
वो संस्कारों से होती है।

दादी की संस्कार हमें मिली,
कभी झूठ नहीं बोलना,
दादा का संस्कार मिला हमें,
सही राहों पर ही चलना।

सब कोई साथ बैठकर खाना,
पहला आदर्श सिखलाये है,
बड़ों का नित आदर सम्मान,
यही संस्कार बतलाये है।

किसी का हक कभी न रखना,
ईमानदारी से ही रहना,
कभी किसी की बुरा न सोचना
बुरा कभी नाही करना।

आज बच्चा अंग्रेजी बोलता है,
कम्प्यूटर मशीन चलाता है,
पर थाली में अन्न छोड़ देता है,
बड़ो से जुबान लड़ाता है।

पितर कोई फोटो ही नहीं,
जो दीवारों पर टंगी हुई,
पितर वो दीप की रोशनी,
जो हमारे भीतर जगी हुई।

फिर से जड़ों की ओर चलें,
उन पितरों को नमन करें,
संस्कारों को जीवन में गढ़ें,
उन आदर्शों को ग्रहण करें।

चन्द्रकला शर्मा
प्रधान पाठक
बेमेतरा छत्तीसगढ़

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