सच अकेले खड़े हैं।

सच अकेले खड़े हैं।

——-

आध्यात्मिकता भी बढ़ रही है 

छल भी बढ़ रहे हैं।

बनाने को संसार में अपनी  स्वच्छ छवि,

राक्षस सम कुछ जन अपने वस्त्र बदल रहे हैं।

 

नर पिशाचों को भी तो देखो 

आज सज्जनों के भेष घढ़ रहे हैं। 

बहुत कठिन है जीना इस संसार में।

करके छल लोग आध्यात्मिकता का जामा पहन रहे हैं। 

 

बहुत भीड़ है श्रद्धालुओं की हर जगह,

 इस मायावी संसार में। 

मालूम नहीं कौन कहां किसको कुचल रहे हैं?

 

पहनकर संस्कारों का जामा देखो, 

सर्वत्र कुसंस्कार पल रहे हैं।

सच को अहंकार है अपने सच्चे होने का,

परंतु झूठ की बनावट ऐसी है कि वह सच से भी सुंदर लग रहे हैं। 

 

झूठ के पीछे चल रहा है संसार सारा,

देखो सब सच दूर कहीं कोने में 

अकेले ही पढ़ रहे हैं।

आध्यात्मिकता भी बढ़ रही है 

छल भी बढ़ रहे हैं।

बनाने को संसार में अपनी  स्वच्छ छवि,

कोई रोको तो, देखो राक्षस सम कुछ जन अपने वस्त्र बदल रहे हैं।

 

मधु वशिष्ठ, फरीदाबाद, हरियाणा

Leave comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *.