काया

🌸 काया
— सरोज प्रसाद राय
यह काया केवल मिट्टी नहीं,
इसमें कितनी इच्छाएँ पलती हैं,
कुछ जिम्मेदारियों के बीच,
कुछ ख्वाहिशें चुपके से चलती हैं।मैं उन्हें भीतर दबाकर
जीना नहीं चाहती हूँ,
जो मन कहता है—कर डालो,
मैं वही कर जाती हूँ।कभी गीतों में मन बहलाती,
कभी वीडियो बना लेती हूँ,
कभी बच्चों के संग बच्ची बनकर
खुद को फिर से पा लेती हूँ।मेरे भीतर एक चंचल लड़की
आज भी साँसें लेती है,
हँसना, गाना, खुलकर जीना—
हर इच्छा मुझसे कहती है।घर है, रिश्ते हैं, जिम्मेदारियाँ,
इनसे मुझे कोई शिकायत नहीं,
पर अपनी काया के भीतर
मैंने खुद को भी छोड़ा नहीं।क्योंकि जीवन केवल
कर्तव्यों का नाम नहीं,
कुछ पल अपने मन से जी लेना भी
किसी नेकी से कम नहीं।कल यह काया मिट्टी होगी,
साँसें भी थम जाएँगी,
फिर आज की दबी इच्छाएँ
किसके हिस्से आएँगी?इसलिए जो पल मिला है,
उसे मैं यूँ ही जाने नहीं देती,
जिंदगी मिली है तो जीती हूँ—
हर इच्छा को मरने नहीं देती।

