घर की सबसे कोमलआवाज

घर की सबसे कोमलआवाज
बेटी
बेटी घर में आती है
तो लगता है जैसे
आँगन में कोई चिड़िया उतर आई हो,
अपनी नन्ही-सी चहचहाहट से
दीवारों को भी घर बना देती है।वह माँ की हथेली पर
उगती हुई एक छोटी-सी रेखा है,
पिता की आँखों में पलता
एक ऐसा सपना है
जिसे विदा करते हुए
आँखें भीग जाती हैं।कल तक जो पूछती थी
“माँ, मैं इतनी बड़ी कब होऊँगी?”
एक दिन वही बेटी
दहलीज़ पर खड़ी होकर पूछती है
“माँ, अब मैं कब आऊँगी?”और माँ के पास
उस सवाल का कोई उत्तर नहीं होता,
बस आँचल की एक गाँठ में
वह अपनी बेटी का बचपन बाँध लेती है।बेटियाँ विदा होती हैं,
मगर घर से जाती कहाँ हैं
एक कमरा खाली होता है,
कुछ आवाज़ें कम हो जाती हैं,
और माँ के भीतर
एक पूरा आँगन हमेशा के लिए बस जाता है।उसे फूल मत दीजिए,
उसके हिस्से का आसमान दीजिए
जहाँ वह अपने नाम से जी सके,
अपने सपनों की राह चुन सके,
और कभी लौटे तो उसे यह न कहना पड़े
“तुम तो अब पराई हो…”
क्योंकि बेटी
कभी पराई होती ही नहीं,
वह तो घर से दूर जाकर भी
घर की सबसे गहरी धड़कन बनी रहती है।
सुमन चड्डा
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

