संस्कारों की जड़े हमारे पितर

 

संस्कारों की जड़े हमारे पितर

पितर ही हमारे जीवन में संस्कारों की नींव हैं। बड़े वृक्ष चाहे कितने ही ऊँचे क्यों न हों, उनकी जड़ें धरती में ही होती हैं। उसी प्रकार हमारे संस्कारों की जड़ हमारे पितरों और पूर्वजों में होती है। उनके दिए हुए संस्कार ही जीवन में हमारे काम आते हैं। संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे बढ़ते हैं। इन्हें किसी पुस्तक में पढ़कर ही नहीं, बल्कि परिवार के आचरण और व्यवहार से सीखा जाता है।

माँ-बाप बचपन से हमें बड़ों का आदर करना, कठिन समय में किसी का मन न दुखाना और सभी से प्रेम करना सिखाते हैं। वे हमें अच्छे शब्द बोलने और बुरे शब्दों से दूर रहने की सीख देते हैं। वे यह भी सिखाते हैं कि हमें जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए। जब हम अपने माता-पिता और बड़ों को ऐसा करते देखते हैं, तो उनसे सीखते हैं। यही सीख आगे चलकर हमारे संस्कार बन जाती है।

हम बच्चे अपने माता-पिता से सीखते हैं और हमारे माता-पिता ने भी अपने माता-पिता से यही संस्कार सीखे होते हैं। इस तरह संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते रहते हैं। हम भी आगे चलकर माता-पिता और पितर बनेंगे और अपनी अगली पीढ़ी को यही संस्कार देंगे।

अगर पितृपक्ष न हो, तो शायद हम अपने दिवंगत प्रियजनों को उसी तरह याद न कर पाएँ। श्राद्ध और पितृपक्ष के माध्यम से हम अपने पितरों को याद करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। इससे उनके दिए हुए संस्कार भी हमारे जीवन में जीवित रहते हैं।

हमारे पूर्वज हमारी स्मृतियों और संस्कारों में ही नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की जड़ों में भी जुड़े हुए हैं। इसलिए नई पीढ़ी के लोगों को भी अपने पितरों और उनके संस्कारों से जोड़ना हमारा कर्तव्य है। यही संस्कार आगे बढ़कर परिवार और समाज को मजबूत बनाते हैं।
— नीलम प्रभा सिन्हा

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