प्रीत

 

प्रीत
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न जाने क्यों मैं तुझ संग प्रीत लगा बैठी …..?
सपने देखे मैंने और तुमने उसे साकार किया ..!!
हंसते खिल खिलाते मेरे जीवन को एक नया आकार दिया !!
संबंध तुमसे जुड़ा मेरा !
दो आत्माओं के मिलन जैसा !
पाणिग्रहण की रस्म को दिल से निभाना सीखा दिया !
बात बहुत छोटी सी थी,
बात बहुत छोटी सी थी,
तुम्हारे हाथ में मुझे रखना था
अपना हाथ …
कुछ मंत्रोच्चारण के साथ … वेदी के चारों ओर घूमते हुए,
अपने हाथों से मेरा हाथ पकड़े हुए ….
बंध गए हमदोनों एक ही प्रीत सूत्र से !
आशीर्वचनों से सभी बड़ों का आशीर्वाद लेकर अपनी गृहस्थी का प्रेम पूर्वक आरंभ किया …!
इस बंधन के प्रीत को सम्मान मिला !
तुमने इसको इतना मान दिया !!
पूरे मन से सम्मान किया
चेहरा जरूर मेरा ही है,
चेहरा जरूर मेरा ही है !
उस पर हँसी तुम्हारी है!
मेरी जो भी छवि अभी है
सारे रंग तुम्हारे हैं !!
निराशा को दूर हटा कर
आशा का दीप प्रज्वलित है
छोटा सा आंगन मेरे मन का
फूलों की खुशियां तुम्हारी है,
कहते हैं लोग मुझे भी
इतनी हंसी कहा से आई
क्या कोई ग़म छिपाई है ….
या
तेरी ये हंसी किसी उधार की दुहाई है ….
मैंने किसी से कुछ नहीं कहा !

बस मेरे परमात्मा !
ये सब तेरा ही आशीर्वाद है ! जो हमें मिला !
जो हमें मिला !
संग यूं ही बनाए रखना !!
हंसी खुशी रहती रहूं !
जीवन ऐसे ही सजाए रखना !
प्रीत हमेशा बना रहे !!
संग ऐसे ही सजाए रखना
नए दिन की आस जगाए रखना !
मेरे मन में अपने लिए यही प्यार बनाये रखना !
न जाने क्यों मैं तुमसे प्रीत लगा बैठी …?
न जाने क्यों….❤️
✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास
मुम्बई

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